Kuch gehra sa likhna tha,


 

Tumse Zyada Kya Likhu

कुछ एहसास ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों में पूरी तरह उतारा नहीं जा सकता।
दिल जितना महसूस करता है, कलम उतना लिख नहीं पाती।
फिर भी इंसान कोशिश करता है — अपने दर्द को, अपनी मोहब्बत को, अपनी तन्हाई को शब्द देने की।

जब दिल में गहराई हो, तो “इश्क़” से बड़ा कोई लफ़्ज़ नहीं लगता।
इश्क़ सिर्फ किसी को चाहना नहीं होता, बल्कि किसी की आदत बन जाना होता है।
वो एहसास, जो हर दुआ में शामिल हो जाए, हर खामोशी में सुनाई दे, और हर मुस्कान के पीछे छिपा रहे — वही असली इश्क़ है।

लेकिन इश्क़ हमेशा मुकम्मल नहीं होता।
कभी-कभी वही मोहब्बत इंसान को सबसे ज्यादा “दर्द” दे जाती है।
दर्द वो नहीं जो आँखों से दिखाई दे, दर्द वो है जो अंदर ही अंदर इंसान को बदल देता है।
वो दर्द, जो रातों को जगाता है, भीड़ में भी अकेला कर देता है, और मुस्कुराते चेहरे के पीछे छिप जाता है।

फिर आते हैं “आँसू”…
आँसू सिर्फ पानी की बूंदें नहीं होते, ये उन जज़्बातों की भाषा हैं जिन्हें शब्द समझा नहीं पाते।
कभी खुशी में निकलते हैं, कभी किसी अपने की याद में, और कभी बिना वजह भी आँखों से बह जाते हैं।
समुंदर की तरह गहरे होते हैं ये आँसू — बाहर से शांत, अंदर से तूफानों से भरे हुए।

और आखिर में जब इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी को देखता है,
तो उसे एहसास होता है कि उसकी हर कहानी, हर दुआ, हर दर्द… किसी एक इंसान से जुड़ा था।
तभी दिल कह उठता है —

“अब ज़िंदगी लिखनी है,
तुमसे ज़्यादा क्या लिखूं…”

क्योंकि कुछ लोग सिर्फ जिंदगी का हिस्सा नहीं होते,
वो पूरी जिंदगी बन जाते हैं।

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