जब रति ने प्रेम की उँगली थामकर
हमारे कमरे में प्रवेश किया
उस रात
कमरे में कोई विशेष रोशनी नहीं थी—
बस खिड़की से आती चाँदनी
धीरे-धीरे फर्श पर बिछी थी,
जैसे रात ने हमारे लिए
सफेद चादर पर
कोई अनकहा प्रेम-पत्र रख दिया हो।
तुम मेरे सामने थीं।
इतनी पास
कि तुम्हारी साँसों की गर्मी
मेरी खामोशी तक पहुँच रही थी,
और इतनी संकोची
कि तुम्हारी आँखें
हर बार मेरी आँखों से मिलकर
फिर झुक जाती थीं।
मैंने तुम्हारा हाथ थामा।
तुम्हारी उँगलियाँ
पहले हल्की-सी काँपीं,
फिर मेरी उँगलियों में
इस तरह ठहर गईं
जैसे कोई नदी
बहते-बहते अचानक
अपना समुद्र पा गई हो।
उस क्षण
हमारे कमरे में
प्रेम पहले आया।
धीरे से।
बिना किसी आहट के।
उसने तुम्हारे बालों को छुआ,
तुम्हारी पलकों पर
चाँदनी रखी
और मेरी हथेली में
तुम्हारा हाथ छोड़ दिया।
फिर रति आई—
प्रेम की उँगली थामे।
उसके कदमों में
कोई जल्दबाज़ी नहीं थी।
वह किसी तूफ़ान की तरह नहीं,
पहली बारिश की तरह आई—
धीरे,
सुगंधित,
और इतनी गहराई से
कि सूखी हुई मिट्टी भी
अपने भीतर की प्यास
भूल गई।
मैंने तुम्हारे माथे को चूमा।
तुमने आँखें बंद कर लीं।
फिर तुम्हारी कनपटियों पर
मेरे होंठ ठहरे—
जहाँ शायद
दिनभर की सारी थकान
धड़कती रहती थी।
तुम्हारी साँस बदल गई।
बस ज़रा-सी।
मगर प्रेमी के लिए
कभी-कभी इतनी-सी हलचल भी
पूरी कविता होती है।
मैंने तुम्हें बाँहों में लिया।
तुम मेरे सीने से लगीं
तो लगा
जैसे किसी लंबे विरह के बाद
दो रास्ते
एक-दूसरे से मिल गए हों।
तुम्हारी हथेली
मेरे सीने पर थी।
मेरी धड़कन
तुम्हारी हथेली के नीचे।
कुछ क्षण हम
कुछ बोले ही नहीं।
बस दो धड़कनें थीं
जो एक-दूसरे की भाषा
धीरे-धीरे सीख रही थीं।
फिर तुमने चेहरा उठाया।
तुम्हारी आँखों में
अब वह संकोच नहीं था।
वहाँ एक धीमी-सी प्यास थी—
वही प्यास
जो शब्दों से नहीं,
सिर्फ़ विश्वास से जन्म लेती है।
मैं तुम्हारे और करीब आया।
हमारे बीच
बस साँस भर की दूरी थी।
उस दूरी में
कितनी सदियाँ थीं—
कितने अधूरे स्पर्श,
कितनी रोकी हुई इच्छाएँ,
कितनी रातों की प्रतीक्षा।
एक चुंबन
उस दूरी के बीच उतरा।
धीरे।
बहुत धीरे।
जैसे चाँद
समुद्र को छूता है
और फिर भी उसकी गहराई
अपने पास नहीं रखता।
तुमने मेरी बाँह
और कसकर पकड़ ली।
और उस छोटी-सी पकड़ में
तुमने जितना कहा,
उतना शायद
पूरी रात के शब्द भी नहीं कह सकते थे।
उस रात
रति ने देह को छुआ,
लेकिन प्रेम
हमारे भीतर उतरता रहा।
साँसें गर्म थीं,
धड़कनें तेज़ थीं,
आँखों में इच्छा थी—
मगर उस इच्छा के भीतर
एक ऐसी कोमलता थी
जो किसी फूल की पंखुड़ी पर
ठहरी ओस जैसी होती है।
कोई जल्दबाज़ी नहीं।
कोई शोर नहीं।
सिर्फ़ निकटता—
जो हर क्षण
थोड़ी और गहरी होती गई।
तुम्हारा सिर
मेरे कंधे पर था।
मेरी उँगलियाँ
तुम्हारे बालों में थीं।
और कमरे की चाँदनी
हम दोनों के चारों ओर
ऐसे ठहरी थी
जैसे रात भी
इस मिलन को
बहुत धीरे से देख रही हो।
उस पल समझ आया—
रति अकेली आए
तो शायद केवल देह तक पहुँचती है,
लेकिन जब वह प्रेम की उँगली थामकर आए,
तो वह मन के उन कमरों तक भी पहुँचती है
जहाँ वर्षों से
कोई प्रवेश नहीं कर पाया।
और जब रात
अपनी अंतिम सीढ़ी उतर रही थी,
तुम मेरे सीने पर
शांत पड़ी थीं।
तुम्हारी साँसें
अब धीमी थीं।
मेरी हथेली
तुम्हारी पीठ पर
बस यूँ ही ठहरी थी।
हमारे बीच
अब कोई बेचैनी नहीं थी।
सिर्फ़ एक गहरी तृप्ति—
जैसे बहुत दूर भटकने के बाद
समुद्र को
अपनी लहरों का घर मिल गया हो।
तुमने आँखें बंद करके
बहुत धीरे से कहा—
“आज रति आई थी…
लेकिन मुझे लगा
जैसे प्रेम ही
मुझसे मिलने आया था।”
मैंने तुम्हारे माथे को चूमा।
और मन ही मन सोचा—
शायद प्रेम का सबसे मादक रूप यही है—
जहाँ देह पास आती है,
साँसें एक-दूसरे में घुलती हैं,
स्पर्श भीतर तक उतरता है,
लेकिन अंत में
दोनों के पास बचता है
एक-दूसरे की देह नहीं—
एक-दूसरे में
मिल जाने का वह एहसास,
जो सुबह होने के बाद भी
रात की तरह
बहुत देर तक
दिल में बना रहता है।
#रिश्ता_रूह_का

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